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Saturday, 27 July 2013

हनुमान चालीसा

दोहा 

 

श्रीगुरु चरण् सरोजरज, निजमनमुकुर सुधार । बरणौ रघुबर बिमल यश, जो दायक फलचार ॥


बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार । बल बुद्धिविद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार ॥

 

 चोपाई


जय हनुमान ज्ञान गुण सागर । जै कपीस तिहुँलोक उजागर ॥

रामदूत अतुलित बलधामा । अंजनि-पुत्र पवन-सुत नामा ॥

महाबीर बिक्रम बजरंगी । कुमति निवार सुमति के संगी ॥

कंचन बरण बिराज सुबेशा । कानन कुंडल कुंचित केशा ॥

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै । काँधे मूँज जनेऊ साजै ॥

शंकर-सुवन केशरी-नन्दन । तेज प्रताप महा जग-वंदन ॥

विद्यावान गुणी अति चातुर । राम काज करिबे को आतुर ॥

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया । रामलषण सीता मन बसिया ॥

सूक्ष्म रूपधरि सियहिं दिखावा । विकट रूप धरि लंक जरावा ॥

भीम रूप धरि असुर सँहारे । रामचन्द्र के काज सँवारे ॥

लाय सजीवन लखन जियाये । श्री रघुबीर हरषि उर लाये ॥

रघुपति कीन्ही बहुत बडाई । तुम मम प्रिय भरतहिसम भाई ॥

सहस बदन तुम्हरो यश गावैं । अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं ॥

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीशा । नारद शारद सहित अहीशा ॥

यम कुबेर दिगपाल जहाँते । कवि कोविद कहि सकैं कहाँते ॥

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा । राम मिलाय राजपद दीन्हा ॥

तुम्हरो मंत्र विभीषण माना । लंकेश्वर भये सब जग जाना ॥

युग सहस्र योजन पर भानू । लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं । जलधि लाँधि गये अचरजनाहीं ॥

दुर्गम काज जगत के जेते । सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥

राम दुआरे तुम रखवारे । होत न आज्ञा बिन पैसारे ॥

सब सुख लहै तुम्हारी सरना । तुम रक्षक काहू को डरना ॥

आपन तेज सम्हारो आपै । तीनों लोक हाँकते काँपै ॥

भूत पिशाच निकट नहिं आवै । महाबीर जब नाम सुनावै ॥

नाशौ रोग हरै सब पीरा । जपत निरन्तर हनुमत बीरा ॥

संकट से हनुमान छुडावै । मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ॥

सब पर राम तपस्वी राजा । तिनके काज सकल तुम साजा ॥

और मनोरथ जो कोइ लावै । सोइ अमित जीवन फल पावै ॥

चारों युग परताप तुम्हारा । है परसिद्ध जगत उजियारा ॥

साधु संत के तुम रखवारे । असुर निकंदन राम दुलारे ॥

अष्टसिद्धि नव निधि के दाता । अस बर दीन जानकी माता ॥

राम रसायन तुम्हरे पासा । सदा रहो रघुपति के दासा ॥

तुम्हरे भजन रामको पावै । जन्म जन्म के दुख बिसरावै ॥

अन्त काल रघुपति पुर जाई । जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई ॥

और देवता चित्त न धरई । हनुमत सेइ सर्व सुख करई ॥

संकट हरै मिटै सब पीरा । जो सुमिरै हनुमत बल बीरा ॥

जै जै जै हनुमान गोसाई । कृपा करहु गुरुदेव की नाई ॥

जोह शत बार पाठ कर जोई । छुटहि बन्दि महासुख होई ॥

जो यह पढै हनुमान चालीसा । होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥

तुलसीदास सदा हरि चेरा । कीजै नाथ हृदय महँ डेरा ॥

दोहा

पवनतनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप ।
रामलषन सीता सहित, हृदय बसहु सुरभूप ॥

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